
लगभग 65 किलोमीटर में नहर की दोनों पटरियों की रिक्त जमीन पर अवैध कब्जा
– इस सरकारी जमीन पर हुए कब्जे की ओर प्रशासन व जिम्मेदार विभागीय अधिकारी आंख उठाकर देखते तक नहीं
– इस पूरी हरित पट्टी पर खड़े विशालकाय पेड़ों का भी मिट गया नमो निशान – बढ़ रहा प्रदूषण
फर्रुखाबाद / उत्तर प्रदेश
अवैध कब्जा वह भी नहर विभाग की नहर पटरी के दोनों ओर लगभग 65 किलोमीटर की लंबाई तक होने के बावजूद भी हर महीने अच्छी खासी पगार वेतन के रूप में प्राप्त करने वाले सुविधा भोगी अधिकारियों को दिखाई नहीं दे रहा है । यदि यही कब्जा कहीं थोड़ी सी भी उस जमीन पर होता जो जगह इन अधिकारियों की खुद की होती तो यह
कैसा महसूस करते । इसका उत्तर सभी समझ रहे हैं ,कब्जे के विरुद्ध कुछ करते जरूर , लेकिन यहां तो सरकारी जमीन पर कब्जा है । उनकी सुविधाओं पर कोई फर्क नहीं , तो फिर क्यों इस ओर देखें ।बता दें की निचली गंगा नहर शाखा फर्रुखाबाद जो डिवीजन विभाजन के बाद जनपद एटा – कासगंज तथा फर्रुखाबाद के सीमावर्ती गांव विजयपुर से शुरू होकर जिला मुख्यालय फर्रुखाबाद के गांव खिलमिनी तक नहर के रूप में लगभग 65 किलोमीटर की लंबाई में स्थित है । खंदी अथवा अन्य उपयोग के लिए नहर की दोनों पटरियों के पास खाली जगह छोड़ी गई थी । इस जगह पर वृक्षारोपण करके वृक्ष तैयार किए गए । जिनमें कीमती पौधों के साथ ही फलदार तथा छायादार विशालकाय वृक्ष कभी लहलाते थे । अतिक्रमण के चलते आज इनका अस्तित्व ही समाप्त हो गया है जो पर्यावरण के लिए आवश्यक था । वर्तमान में हालात यह है कि विजयपुर गांव से लेकर ग्राम गढ़िया जगन्नाथ, महमूदपुर पट्टी सपाह , रसीदपुर , अलियापुर, सोतेपुर , नरैनामऊ , तथा नरैनामऊ से संबंध मजरा नगला पुलका , शिवरई बरियार , झब्बूपुर , नरसिंहपुर , भटासा से लेकर अंतिम छोर ग्राम खिलमिनी तक नहर पटरी के दोनों ओर की रिक्त सरकारी भूमि पर कुछ एक स्थान को छोड़कर बाकी पूरी की पूरी इस सरकारी जमीन पर अवैध कब्जा हो चुका है । कहीं पर अवैध कबजेदारों ने यह जमीन अपने खेतों में मिला ली तो कहीं-कहीं अस्थाई या स्थाई रूप से निर्माण कार्य करा – कर कब्जे में ले लिया है । इस अवैध कब्जेदारी के चलते यहां की हरित पट्टी उजड़ गई , इस पूरे पट्टी क्षेत्र में कई तरह के वन्य जीव रहते थे । जिनमें कुछ दुर्लभ प्रजापति के भी थे । अब कोई दिखाई नहीं देता, ना छाया रही ना फलदार पेड़ रहे । हालांकि इसकी देखरेख वन विभाग के जिम्में थी, उसने भी अपनी जिम्मेदारी से आंखें फेर लीं । जबकि वास्तव में हरे पेड़ों का होना पर्यावरण के लिए आवश्यक था । वहीं नहर विभाग के अधिकारी तो बिल्कुल ही कुंभकरण की नींद में सोए हुए हैं । उन्हें अपने कर्तव्य क्षेत्र की अवैध रूप से कब्जा की गई जमीन पर कब्जा ही दिखाई नहीं दे रहा है। जबकि कोई भी देखे तो नहर विभाग की इस जमीन पर अवैध कब्जेदार कहीं जानवर बांधे हुए हैं तो कहीं कूड़े करकट और घूड़े के ढेर लगाकर कब्जा किए हैं । और कहीं-कहीं तो अवैध कबजेदारों ने अस्थाई एवं स्थाई निर्माण तक कर लिया है । लेकिन नहर विभाग के अधिकारियों को कोई फर्क नहीं पड़ता । नहर की आराजी के दोनों ओर ब्रिटिश काल से ही पक्के पुख्ता मोटे पत्थर की शिलाएं लगाई गई थीं । जिससे इस आरजी का पता लगता रहे और कोई भी अवैध कब्जा न कर सके । जानकार बताते हैं कि काफी समय पहले तक इस सरकारी जमीन की हर साल देखरेख करके उन्हीं चिन्हों के हिसाब से इसे सुरक्षित कर दिया जाता था। यदि कोई अवैध कब्जे का प्रयास करता था तो उसके विरुद्ध कार्यवाही होती थी । इसलिए कब्जा नहीं हो पाता था । लेकिन आज जब शासन से अच्छा खासा वेतन लेने वाले अधिकारी हैं तब अवैध कब्जा अपने चरम पर पहुंच गया । अब तो इस पूरे 65 किलोमीटर लंबाई के दोनों ओर के भागों पर अपवादों को छोड़कर हर जगह अवैध कब्जा करके अवैध कब्जेदारों ने सरकारी जमीन को हथिया लिया है । जिससे कई तरह के नुकसान हो रहे हैं । आम आदमी को परेशानी हो रही है । वहीं हरे भरे पेड़ पूरी तरह समाप्त हो गए हैं । इसमें रहने वाले वन्य जीवों की शरण स्थली भी उजड़ गई। पर्यावरण प्रदूषण के हिसाब से भी यह अवैध कब्जा अभिशाप ही साबित हो रहा है । क्षेत्रीय जागरूक तथा प्रबुद्धजीबी लोगों का कहना है कि इसके लिए नहर विभाग के अधिकारी तथा प्रशासन पूरी तरह जिम्मेदार हैं । उन्हें चाहिए कि राजस्व अभिलेखों में दर्ज नहर रकवा की पैमाइश कराकर इस रकवे को अवैध कब्जेदारों के चंगुल से मुक्त कराएँ।






